"भगत सिंह" को कौन नहीं जनता पर हमारे समाज के कुछ उपद्रवी लोग इनके नाम पे अपनी राजनीती की रोटी सेक रहे है और हमें गलत पाठ पढ़ा रहे, और उपद्रव मचा रहे है । भगत सिंह का जनम सत्र 28 सितम्बर 1907 में पंजाब के जिला लायलपुर में बंगा गाउ (जो अब पाकिस्तान में है ) मे हुआ था । इन्हें फाँसी की सजा 7 अक्टूबर 1930 को सुनाई गयी थी और फाँसी की तारीख 24 मार्च 1930 को देना तय हुआ मगर अंग्रेज़ो ने "भगत सिंह , राज गुरु , और सुखदेव सिंह" तीनो देश भक्तो को 11 घंटे पहले 23 मार्च 1931 संध्या 7:33 बजे फाँसी पे लटका दिया था । उस वक़्त अंग्रेजो ने हमे लुटा और हमपे शासन किया और आज कुछ लोग उनका नाम ले कर देश भक्ति दिखा के हमारा शोषण कर रहे है इनका कहना है हमारे देश भक्तो को जिस दिन फासी की सजा सुनाई गयी थी उस दिन हम "वैलेंटाइन डे " (valentine day) न मनाये , मान्यवर "वैलेंटाइन डे " (valentine day) 14 फेब को मनाया जाता है ये वेस्टर्न कल्चर जरूर है पर इससे किसी का नुकसान नहीं होता इतिहास का पन्ना अगर आप पलट कर देखो तो हमारे राजा -महाराजाओ की 3 -4 शादी तो आम बात थी और उसके बावजूद उन्हें प्रेम होता था और वो उनसे भी विवाह कर लेते थे क्या ये गलत नहीं था ? आज के युवा जो "वैलेंटाइन डे " (valentine day) बनाते है जिससे वे प्रेम करते है उनके लिए ये खास दिन मानते है वे अपने प्रेमिका के लिए ग्रीटिंग कार्ड , चॉक्लेट ,गुलाब दे के अपने प्यार का इज़हार करते है इसमें गलत क्या है ? हाँ में मानता हु एक सिक्के के 2 पहलु होते है ,प्यार का झांसा दे के गलत करते है पर ये तो 12 महीना होता है क्या आपकी देश भक्ति सिर्फ 14फरवरी को ही जगती है ? मेरे नजरिये से ये गलत नहीं है हा अगर कोई गलत हरकत कर रहा हो तो ये गलत में मानता हूँ , पर "वैलेंटाइन डे " (valentine day) के दिन किसी प्रेमी जोड़े को देखलो तो वेस्टर्न कल्चर फैला रहा है हमारे सभय्ता का मज़ाक उड़ाया जा रहा है ?ये सब कह आप नारे बजी करते हो क्या ये सही है? क्या उस वक़्त आपके सभय्ता का मजाक नहीं बनता जब हमारे देश में एक औरत की इज़्ज़त लुटली जाती है तब आप सभी दिखाई नहीं देते ,औरत पे हाथ उठाते वक़्त नहीं सोचते ,औरत को अपने वासना का शिकार बनाने के वक़्त नहीं सोचते ,अगर कोई खूबसूरत औरत /लड़की आपके बगल से पार हो जाये तो ऐसे देखते है जैसे अपनी आँखों से ही उसकी इज़्ज़त लूट लोगे पर "वैलेंटाइन डे " (valentine day) के दिन आप प्रेमी जोड़ो को देख लो तो आप उनकी पिटाई कर देते हो जबरदस्ती शादी करवा देते हो ऐसा क्यू ?
05:44
"भगत सिंह" को कौन नहीं जनता पर हमारे समाज के कुछ उपद्रवी लोग इनके नाम पे अपनी राजनीती की रोटी सेक रहे है और हमें गलत पाठ पढ़ा रहे, और उपद्रव मचा रहे है ।
भगत सिंह का जन्म सत्र 28 सितम्बर 1907 में पंजाब के जिला लायलपुर में बंगा गाउ (जो अब पाकिस्तान में है ) मे हुआ था । इन्हें फाँसी की सजा 7 अक्टूबर 1930 को सुनाई गयी थी और फाँसी की तारीख 24 मार्च 1930 को देना तय हुआ मगर अंग्रेज़ो ने "भगत सिंह , राज गुरु , और सुखदेव सिंह" तीनो देश भक्तो को 11 घंटे पहले 23 मार्च 1931 संध्या 7:33 बजे फाँसी पे लटका दिया था ।
उस वक़्त अंग्रेजो ने हमे लुटा और हमपे शासन किया और आज कुछ लोग उनका नाम ले कर देश भक्ति दिखा के हमारा शोषण कर रहे है इनका कहना है हमारे देश भक्तो को जिस दिन फासी की सजा सुनाई गयी थी उस दिन हम "वैलेंटाइन डे " (valentine day) न मनाये , मान्यवर "वैलेंटाइन डे " (valentine day) 14 फेब को मनाया जाता है ये वेस्टर्न कल्चर जरूर है पर इससे किसी का नुकसान नहीं होता इतिहास का पन्ना अगर आप पलट कर देखो तो हमारे राजा -महाराजाओ की 3 -4 शादी तो आम बात थी और उसके बावजूद उन्हें प्रेम होता था और वो उनसे भी विवाह कर लेते थे क्या ये गलत नहीं था ?
आज के युवा जो "वैलेंटाइन डे " (valentine day) बनाते है जिससे वे प्रेम करते है उनके लिए ये खास दिन मानते है वे अपने प्रेमिका के लिए ग्रीटिंग कार्ड , चॉक्लेट ,गुलाब दे के अपने प्यार का इज़हार करते है इसमें गलत क्या है ?
हाँ में मानता हु एक सिक्के के 2 पहलु होते है ,प्यार का झांसा दे के गलत करते है पर ये तो 12 महीना होता है
क्या आपकी देश भक्ति सिर्फ 14फरवरी को ही जगती है ?
मेरे नजरिये से ये गलत नहीं है हा अगर कोई गलत हरकत कर रहा हो तो ये गलत में मानता हूँ , पर "वैलेंटाइन डे " (valentine day) के दिन किसी प्रेमी जोड़े को देखलो तो वेस्टर्न कल्चर फैला रहा है हमारे सभय्ता का मज़ाक उड़ाया जा रहा है ?ये सब कह आप नारे बजी करते हो क्या ये सही है? क्या उस वक़्त आपके सभय्ता का मजाक नहीं बनता जब हमारे देश में एक औरत की इज़्ज़त लुटली जाती है तब आप सभी दिखाई नहीं देते ,औरत पे हाथ उठाते वक़्त नहीं सोचते ,औरत को अपने वासना का शिकार बनाने के वक़्त नहीं सोचते ,अगर कोई खूबसूरत औरत /लड़की आपके बगल से पार हो जाये तो ऐसे देखते है जैसे अपनी आँखों से ही उसकी इज़्ज़त लूट लोगे पर "वैलेंटाइन डे " (valentine day) के दिन आप प्रेमी जोड़ो को देख लो तो आप उनकी पिटाई कर देते हो जबरदस्ती शादी करवा देते हो ऐसा क्यू ?
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सारी अपराध की जड़ - जर और जोरू
05:30
आज तक इतिहास गवाह है सारे लड़ाई /झगडे के पीछे 2 ही कारन होते है या तो जर या जोरू (जमीन/जायदाद या बीवी /गर्लफ्रेंड )। और सचाई यह है इन दोनो मे साथ आपके कोई नही जाता - जिस जगह के लिए हम यहाँ लड़ते है वो जगह वही रहती है बस उसके ऊपर रहने वाले इन्सान अकसर बदल जाते है पर इन्हें साथ कोई नही
ले जा पाया आजतक, तो सवाल ये है की जिस वस्तु को हम ले जा न सके अपने साथ उसके लिए सारा जीवन कलह करते -करते बिता देते है और हमारे साथ कुछ नहीं जाता फिर इस मृगतृष्णा में क्यू रहते है की ये हमारा है ?
सोचने वाली बात ये है की कुछ रह जाता है तो हमारी यादें हमारे अच्छे कार्य जो हमने अपने जीवन काल में किया हो ।
अब बात करते है जोरू की - तो मेरे अनुमान से जब तक ये आपके कदम से कदम मिला के चलती है तब तक ये आपके नाम - सौर्य को बढ़ाती है अगर आप से ये हट कर फैसले ले तो ये आपके वंस के नास का कारन बन जाती है । इनका चरित्र ही आपको "सौर्य या विनास" के राह पे ले जाता है ।
अगर हम भूतकाल मे जाते है और इतिहास के पन्नो को पलटे तो महाभारत होने का कारन भी यही था ? और रामायण की रचना में भी इन्ही का वर्णन है । अगर इस दुनिया में आप रह के कुछ पाना चाहते है तो आप कितनो के साथ आप अपना मधुर समंध बना सके , उनके दिल में अपने लिए जगह बना सके ,क्यू की इस दुनिया में आने वाले हर इंसान को जाना अनिवार्य है बस आप के याद , आपकी दी हुई क़ुर्बानियां ही याद रेह जायंगे और लोग आपको याद रखेंगे । इसलिए अपने जीवन के धर्म कांटे को चलने के लिए लोभ - लालच को त्याग के अपने जीवन का आनंद लेना चाहिए और चरित्र हिन् स्त्री से दुरी बनाए रखना अति आवस्यक है ।
श्रद्धा या अन्धविश्वास
06:52
के बक्सर बलिहार गांव के रहने वाले है उन्होंने खुद कि बलि दे डाली उनकी श्रद्धा "माँ छित्र-
मस्तिका"के प्रति देख कर मे अति विचलित हो गया की आज के इस आधुनिक युग भी प्रतिमा
पुजा के पीछे इतनी आस्था है , जो अपना बलिदान दे सके मुझे कही देखने को नही मिला ।
आजतक मैंने सिर्फ ये देखा है की मंदिर में पूजा के लिए लोगो में आस्था है , श्रद्धा है ,लोग मन्नत मांगते है उनकी मन्नत पूरी होने पे वे जानवरो की बलि दे देते है । पर खुद की बलि देना मेने सिर्फ किताबो में पढ़ा था या अपने बुजुर्गो से सुना था , पर सच में कोई ऐसा कर सकता है आज पहली बार जानने को मिला ।
*क्या उसकी कोई मनोकामना पूर्ण हुई थी ?
*उसने ऐसा क्यो किया , क्या उसकी श्रद्धा थी एक अंध्विश्वास है ये ?
*अगर ये अन्धविश्वास है ? तो बेजुबान जानवरो की बलि देना अंध्विश्वास नही है क्या ?
*कभी ईश्वर ने हमें ये कहा है क्या? की खुद की बली दो या किसी बेज़ुबान जानवर की अगर नहीं तो हम ऐसा क्यों करते है ?
आज "संजय बट " ने अपना बलिदान दिया माँ के लिए इतनी श्रद्धा दिखाई इससे लोग पागल केह रहे है क्या वे लोग पागल नहीं जो बेज़ुबान जानवरो की बलि देते है अपने स्वार्थ के लिए ?क्या ये अंध्विश्वास नहीं ?
अगर अन्धविश्वास है तो आप क्यों देते हो ? और श्रद्धा है विश्वास है तो "संजय बट "की आस्था का मजाक क्यों बनाया जा रहा है ?
ये एक छोटा सा सवाल है जिसे में जानना चाहता हूँ , पर शायद इसका जवाब किसी के पास नहीं होगा ।
पर में इस बात पे कुछ कहना चाहता हु कही न कही - कोई न कोई शक्ति तो है जिससे ये दुनिया चलती है ।
जन्म लेने के बाद उसकी मृत्यु निश्चित होती है उसी प्रकार ये भी सत्य है की ईश्वर ने हमें कभी नहीं कहा आप बलि दो अगर आपकी आस्था उनपे है तो आप अपने बुराई की बलि दो , घमंड की बलि दो ।
मेरी नज़र में नहीं लगता संजय बट ने कुछ गलत किया आज उन्होंने अपनी बलि देकर हमें सच्चाई से रूबरू करवाया है और अपना बलिदान दे कर कर खुद को अमर कर लिया है आज के बाद लोग हमेशा उन्हें याद रखेंगे की माँ छित्रमस्तिका के एक ऐसे भक्त थे जिन्होंने अपनी श्रद्धा से खुद की बलि दी थी भगवन उनकी आत्मा को शांति दे ।
रानी पद्मिनी का इतिहास
03:27
रानी पद्मिनी – पद्मावत की एक महान रानी थी, जिनपर कवी मलिक मुहम्मद जायसी ने एक कविता भी लिखी है। रानी पद्मावती अपनी सुन्दरता के लिये पुरे भारत में जानी जाती थी।
लेकिन रानी पद्मिनी के अस्तित्व को लेकर इतिहास में कोई दस्तावेज मौजूद नही है। लेकिन पद्मावत में हमें रानी पद्मावती की छाप दिखाई देती है।
[बोलहु सुआ पियारे-नाहाँ । मोरे रूप कोइ जग माहाँ ?]
सुमिरि रूप पदमावति केरा । हँसा सुआ, रानी मुख हेरा ॥
पद्मिनी ने अपना जीवन अपने पिता गंधर्वसेन और माता चम्पावती के के साथ सिंहाला में व्यतीत किया था। पद्मिनी के पास एक बोलने वाला तोता “हीरामणि” भी था। उनके पिता ने पद्मावती के विवाह के लिये स्वयंवर भी आयोजित किया था जिसमे आस-पास के सभी हिन्दू-राजपूत राजाओ को आमंत्रित किया गया था। एक छोटे से राज्य के राजा मलखान सिंह भी उनसे विवाह करने के लिये पधारे थे। चित्तोड़ के राजा रावल रतन सिंह रानी नागमती के होते हुए भी स्वयंवर में आये थे, और उन्होंने मलखान सिंह को पराजित कर पद्मिनी से विवाह भी कर लिया था, क्योकि राजा रावल रतन सिंह स्वयंवर के विजेता थे। स्वयंवर के बाद वे अपनी सुंदर रानी पद्मिनी के साथ चित्तोड़ लौट आये थे।
12 वी और 13 वी शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के आक्रमणकारीयो की ताकत धीरे-धीरे बढ़ रही थी। इसके चलते सुल्तान ने दोबारा मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया था। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने सुंदर रानी पद्मावती को पाने के इरादे से चित्तोड़ पर भी आक्रमण कर दिया था। यह पूरी कहानी इतिहासकार अलाउद्दीन के लिखान पर आधारित है जिन्होंने इतिहास में राजपूतो पर हुए आक्रमणों को अपने लेखो से प्रदर्शित किया था। लेकिन कुछ लोगो को उनकी इन कहानियो पर जरा भी भरोसा नही था क्योकि उनके अनुसार अलाउद्दीन के लेख मुस्लिम सूत्रों पर आधारित थे, जिसमे मुस्लिमो को महान बताया गया था। उनके अनुसार अलाउद्दीन ने इतिहास के कुछ तथ्यों को अपनी कलम बनाकर काल्पनिक सच्चाई पर आधारित कहानियाँ बनायी थी।
उन दिनों चित्तोड़ राजपूत राजा रावल रतन सिंह के शासन में था, जो एक बहादुर और साहसी योद्धा भी थे। एक प्रिय पति होने के साथ ही वे एक बेहतर शासक भी थे, इसके साथ ही रावल सिंह को कला में भी काफी रूचि थी। उनके दरबार में काफी बुद्धिमान लोग थे, उनमे से एक संगीतकार राघव चेतन भी था। ज्यादातर लोगो को इस बात की जानकारी आज भी नही है की राघव चेतन एक जादूगर भी थे। वे अपनी इस कला का उपयोग शत्रुओ को चकमा या अचंभित करने के लिये आपातकालीन समय में ही करते थे।
लेकिन राघव सिंह के कारनामे सभी के सामने आने के बाद राजा बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने उसे अपने राज्य से निकाले जाने का भी आदेश दिया था। और उनके चेहरे को काला कर उन्हें गधे पर बिठाकर राज्य में घुमाने का आदेश भी दिया था। इस घटना के बाद वे राजा के सबसे कट्टर दुश्मनों में शामिल हो गए थे। इसके बाद राघव चेतन ने दिल्ली की तरफ जाने की ठानी और वहाँ जाकर वे दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को चित्तोड़ पर आक्रमण करने के लिये मनाने की कोशिश करते रहते।
दिल्ली आने के बाद राघव चेतन दिल्ली के पास ही वाले जंगल में रहने लगे थे, जहाँ सुल्तान अक्सर शिकार करने के लिये आया करते थे। एक दिन सुल्तान के शिकार की आवाज सुनते ही राघव ने अपनी बांसुरी बजाना शुरू कर दी। जब राघव चेतन की धुन सुल्तान की सेना और उन्हें सुनाई दी तो वे सभी आश्चर्यचकित हो गए थे की इस घने जंगल में कौन इतनी मधुर ध्वनि से बाँसुरी बजा रहा होगा। सुल्तान ने अपने सैनिको को बाँसुरी बजाने वाले इंसान को ढूंडने का आदेश दिया और जब राघव चेतन स्वयं उनके सामने आये तब सुल्तान ने उनसे अपने साथ दिल्ली के दरबार में आने को कहा। तभी राघव चेतन ने सुल्तान से कहाँ की वह एक साधारण संगीतकार ही है और ऐसे ही और भी बहुत से गुण है उसमे। और जब राघव चेतन ने अलाउद्दीन को रानी पद्मावती की सुन्दरता के बारे में बताया तो अलाउद्दीन मन ही मन रानी पद्मावती को चाहने लगे थे। इसके तुरंत बाद वे अपने राज्य में गये और अपनी सेना को चित्तोड़ पर आक्रमण करने का आदेश दिया, ताकि वे बेहद खुबसूरत रानी पद्मावती को हासिल कर सके और अपने हरम में ला सके।
चित्तोड़ पहुचते ही अलाउद्दीन खिलजी के हाथ निराशा लगी क्योकि उन्होंने पाया की चित्तोड़ को चारो तरफ से सुरक्षित तरीके से सुरक्षा प्रदान की गयी है। लेकिन वे रानी पद्मावती की सुन्दरता को देखने का और ज्यादा इंतज़ार नही करना चाहते थे इसीलिए उन्होंने राजा रतन सिंह के लिये यह सन्देश भेजा की वे रानी पद्मावती को बहन मानते है और उनसे मिलना चाहते है। इसे सुनने के बाद निराश रतन सिंह को साम्राज्य को तीव्र प्रकोप से बचाने का एक मौका दिखाई दिया। इसीलिये उन्होंने अपनी पत्नी को अलाउद्दीन से मिलने की आज्ञा भी दे दी थी।
रानी पद्मावती ने भी अलाउद्दीन को उनके प्रतिबिम्ब को आईने में देखने की मंजूरी दे दी थी। अलाउद्दीन ने भी निर्णय लिया की वे रानी पद्मावती को किसी भी हाल में हासिल कर ही लेंगे। अपने कैंप ने वापिस आते समय अलाउद्दीन कुछ समय तक राजा रतन सिंह के साथ ही थे। सही मौका देखते ही अलाउद्दीन ने राजा रतन सिंह को बंदी बना लिया और बदले में रानी पद्मावती को देने के लिये कहा।
सोनगरा के चौहान राजपूत जनरल गोरा और बादल ने सुल्तान को उन्ही के खेल में पराजित करने की ठानी और कहा की अगली सुबह उन्हें रानी पद्मावती दे दी जायेंगी। उसी दिन 150 पालकी (जिसे पूरी तरह से सजाकर, ढककर उस समय में चार इंसानों द्वारा एक स्थान से स्थान पर ले जाया जाता था, उस समय इसका उपयोग शाही महिलाये एक स्थान से दुसरे स्थान पर जाने के लिए करती थी) मंगवाई और उन्हें किले से अलाउद्दीन के कैंप तक ले जाया गया और पालकीयो को वही रोका गया जहाँ राजा रतन सिंह को बंदी बनाकर रखा गया था। जब राजा ने देखा की पालकियाँ चित्तोड़ से आयी है तो राजा को लगा की उसमे रानी भी आयी होगी और ऐसा सोचकर ही वे शर्मिंदा हो गये थे। लेकिन जब उन्होंने देखा की पालकी से बाहर रानी नही बल्कि उनकी महिला कामगार निकली है और सभी पालकियाँ सैनिको से भरी हुई है तो वे पूरी तरह से अचंभित थे। सैनिको ने पालकी से बाहर निकालकर तुरंत अलाउद्दीन के कैंप पर आक्रमण कर दिया और सफलता से राजा रतन सिंह को छुड़ा लिया। जिसमे दोनों राजपूत जनरल ने बलपूर्वक और साहस दिखाकर अलाउद्दीन की सेना का सामना किया था और रतन सिंह को उन्होंने सुरक्षित रूप से महल में पंहुचा दिया था। जहाँ रानी पद्मावती उनका इंतजार कर रही थी।
इस बात को सुनते ही सुल्तान आग-बबूला हो चूका था और उसने तुरंत चित्तोड़ पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। सुल्तान की आर्मी ने चित्तोड़ की सुरक्षा दिवार को तोड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन ऐसा करने में वे सफल नही हो सके। तभी अलाउद्दीन ने किले को चारो तरफ से घेरना शुरू कर दिया। ऐसा पाते ही राजा रतन सिंह ने सभी राजपूतो को आदेश दे दिया की सभी द्वार खोलकर अलाउद्दीन की सेना का सामना करे। आदेश सुनते ही रानी पद्मावती ने देखा की उनकी सेना का सामना विशाल सेना से हो रहा है और तभी उन्होंने चित्तोड़ की सभी महिलाओ के साथ जौहर करने का निर्णय लिया, उनके अनुसार दुश्मनों के हाथ लगने से बेहतर जौहर करना ही था।
जौहर एक इसी प्रक्रिया है जिनमे शाही महिलाये अपने दुश्मन के साथ रहने की बजाये स्वयं को एक विशाल अग्निकुंड में न्योछावर कर देती है।
इस तरह खुद का जौहर कर उन्होंने आत्महत्या कर दी थी। जिसमे एक विशाल अग्निकुंड में चित्तोड़ की सभी महिलाये ख़ुशी से कूद गयी थी। यह खबर पाते ही चित्तोड़ के सैनिको ने पाया की अब उनके पास जीने का कोई मकसद नही है और तभी उन्होंने सका करने का निर्णय लिया। जिसमे सभी सैनिक केसरी पोशाक और पगड़ी के पहनावे में सामने आये और उन्होंने अलाउद्दीन की सेना का मरते दम तक सामना करने का निर्णय लिया था। इस विनाशकारी विजय के बाद अलाउद्दीन की सेना केवल राख और जले हुए शरीर को देखने के लिये किले में आ सकी।
आज भी चित्तोड़ की महिलाओ के जौहर करने की बात को लोग गर्व से याद करते है। जिन्होंने दुश्मनों के साथ रहने की बजाये स्वयं को आग में न्योछावर करने की ठानी थी। राणी पद्मिनी – के बलिदान को इतिहास में सुवर्ण अक्षरों से लिखा गया है।
मन की शांति कहा ?
09:57
आज के इस वक़्त मे सब अशांत है ,किसी के पास किसी के लिए वक़्त कहा हम सब अपने निजी कार्य मे कुछ इस कदर व्यस्त है -
एक को दो और दो को चार करने में, हमे इस बात का ज्ञात नही की हम अपनी सारी जिंदगी जिस चीज़ के पीछे खर्च कर रहे है उससे हमे शांति मिलेगी या नही मिलने वाली पर फिर भी हम अपनी सारी जिंदगी उसी में बिता देते है, जब वक़्त आता है तब हमे इस बात का ज्ञात होता है, की हमे आज तक शांति नहीं मिली क्योंकि हम खुद को आजतक । एक को दो और दो को चार करने में लगे थे , और हमारी सोच ये थी की हम पैसे से सारी ख़ुशी खरीद सकते है पर ऐसा होता नही । असली ख़ुशी मन की ख़ुशी होती है ।
अगर मेरी बातो से लगे की में गलत केह रहा हू तो आप "शमशान घाट" (जहाँ मुर्दो को जलाया जाता है ) वहा जा के एकांत कुछ देर बैठ जाओ आप के दिल - दिमाग में एक ही प्रश्न आएगा , एक दिन आपके साथ भी यही होना है , जिस सुंदरता के पीछे भाग रहे थे , जिस के लिए सब कर रहे है वो सारी चीजे यही तक के लिए है हमारे साथ कुछ भी नही जाने वाला बस यहाँ कुछ रह जाएँगी तो आपकी यादें
एक को दो और दो को चार करने में, हमे इस बात का ज्ञात नही की हम अपनी सारी जिंदगी जिस चीज़ के पीछे खर्च कर रहे है उससे हमे शांति मिलेगी या नही मिलने वाली पर फिर भी हम अपनी सारी जिंदगी उसी में बिता देते है, जब वक़्त आता है तब हमे इस बात का ज्ञात होता है, की हमे आज तक शांति नहीं मिली क्योंकि हम खुद को आजतक । एक को दो और दो को चार करने में लगे थे , और हमारी सोच ये थी की हम पैसे से सारी ख़ुशी खरीद सकते है पर ऐसा होता नही । असली ख़ुशी मन की ख़ुशी होती है ।
अगर मेरी बातो से लगे की में गलत केह रहा हू तो आप "शमशान घाट" (जहाँ मुर्दो को जलाया जाता है ) वहा जा के एकांत कुछ देर बैठ जाओ आप के दिल - दिमाग में एक ही प्रश्न आएगा , एक दिन आपके साथ भी यही होना है , जिस सुंदरता के पीछे भाग रहे थे , जिस के लिए सब कर रहे है वो सारी चीजे यही तक के लिए है हमारे साथ कुछ भी नही जाने वाला बस यहाँ कुछ रह जाएँगी तो आपकी यादें
06:40
मन क़ो अन्य प्राणियों से अलग करने वाली उसे विशिष्ट सिद्धि करने वाली कोई चीज़ इस शरीर में है-
तो वो है मस्तिष्क ,जहाँ विचार ,कल्पना ,इक्छाएं और भावनाएं बसती है । शरीर के अन्य किसी भी
अव्यय में इतनी सक्रियता ,संवदेनशीलता और पेना पन नही होता ,जितना की मस्तिक में । उसकी
विशेषताओ के कारण ही मस्तिष्क को मानवीय -सत्ता का केंद्र -बिंदु आधार माना जाता है । रेलगाड़ी
में जो महत्व इंजन का होता है ,वही महत्व मानव शरीर मे मस्तिष्क है । इसीलिए मस्तिष्क की
हड्डियो से बनी एक पिटारी मे रखी लुगदी की -छोटी सी टोकरी को समस्त ज्ञान -विज्ञानं और सभ्यता
के विकाश का आधार भूत केंद्र कहा गया है । जब कभी किसी को बहुत अधिक सम्मान ,बहुत अधिक
स्नेह और बहुत अधिक प्यार दिया जाता है तो यही कहा जाता है की उसे सर पे बिठा लिया गया ।
सम्मानित व्यक्ति के लिए सरताज संबोधन ,विशेषण का उपयोग अकारण या निरर्थक ही नहीं है । यह
संबोधन ,विशेषण मस्तिष्क के ,सिर के महत्व को प्रतिपादित करते है ।
हमारा मानना है की कल्पवृझ के निचे बैठने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है । ऐसे
वृझ का अस्तित्व इस प्रकृति जगत में असंभव है,लेकिन एक प्रत्यछ कल्पवृझ मनुष्य को मस्तिष्क के
रूप में मिला हुआ है , जिसकी आराधना से वह सब कुछ अनायस ही प्राप्त होता रहता है ,जिनकी मनुष्य कामना व आराधना करता है । हमारा शरीर तो माँ के गर्भ से जन्म लेता है, परन्तु भले -बुरे व्यक्ति का
जन्म कहा से होता है ? जरा आप गौर से सोचोगे और इसकी खोज करोगे तो आपको इसका उत्तर मिलेगा ॥
to be continued..........
तो वो है मस्तिष्क ,जहाँ विचार ,कल्पना ,इक्छाएं और भावनाएं बसती है । शरीर के अन्य किसी भी
अव्यय में इतनी सक्रियता ,संवदेनशीलता और पेना पन नही होता ,जितना की मस्तिक में । उसकी
विशेषताओ के कारण ही मस्तिष्क को मानवीय -सत्ता का केंद्र -बिंदु आधार माना जाता है । रेलगाड़ी
में जो महत्व इंजन का होता है ,वही महत्व मानव शरीर मे मस्तिष्क है । इसीलिए मस्तिष्क की
हड्डियो से बनी एक पिटारी मे रखी लुगदी की -छोटी सी टोकरी को समस्त ज्ञान -विज्ञानं और सभ्यता
के विकाश का आधार भूत केंद्र कहा गया है । जब कभी किसी को बहुत अधिक सम्मान ,बहुत अधिक
स्नेह और बहुत अधिक प्यार दिया जाता है तो यही कहा जाता है की उसे सर पे बिठा लिया गया ।
सम्मानित व्यक्ति के लिए सरताज संबोधन ,विशेषण का उपयोग अकारण या निरर्थक ही नहीं है । यह
संबोधन ,विशेषण मस्तिष्क के ,सिर के महत्व को प्रतिपादित करते है ।
हमारा मानना है की कल्पवृझ के निचे बैठने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है । ऐसे
वृझ का अस्तित्व इस प्रकृति जगत में असंभव है,लेकिन एक प्रत्यछ कल्पवृझ मनुष्य को मस्तिष्क के
रूप में मिला हुआ है , जिसकी आराधना से वह सब कुछ अनायस ही प्राप्त होता रहता है ,जिनकी मनुष्य कामना व आराधना करता है । हमारा शरीर तो माँ के गर्भ से जन्म लेता है, परन्तु भले -बुरे व्यक्ति का
जन्म कहा से होता है ? जरा आप गौर से सोचोगे और इसकी खोज करोगे तो आपको इसका उत्तर मिलेगा ॥
to be continued..........
Broadening of goals
02:40
Identification takes place as a mental mechanism and remains
unnoticed for most of the time. As the socially most important
form of learning, it is a necessary precondition for personality
development. But if the identification model is not developed
further in accordance with the prevailing level of personality,
it can cause disturbance and conflicts. These are based on
the misunderstanding that one does not differentiate between
one's own personality and behavior patterns of the model.
The prerequisite for understanding what another person is
thinking or feeling is that we put ourselves in his position
This action can be a projection.
Projection means the transfer of conscious and
unconscious expectations, as well as characteristics of one's
own personality to the outer world and the social partners.
People unknowingly use "projection" to see them in themselves.
They possess but do not want to see them in themselves. They
see the thorn in others' eyes but not the beam in their own eyes.
"projection" is a systematic dishonesty against oneself and
injustice towards the partner.An example of this is an aggressive
person. If asked why he attacks others, treats them impolitely and
dishonestly, hurts and abuses them, he will reply that he must
defend himself because the others are so big and mean and the
world is so unjust.
Not everyone who has a bald head, has overturned a bottle
of oil.
One can interest this to mean: Do not judge others by
your own standards; ask for the motives.
Questions: Tell me, why do you play the piano for five hours
every day?
Answer: One must only know what one wants.
Questin: And what do you want?
Answer: The adjacment apartment.
A man accompained his friend to the railway station.
When they reached there, the train was ready for departure.
Both the men ran behind the train. One of them succeeded in
jumping into the train. The other man doubled up with
laughter. When someone asked him the reason, he replid,
"Actually I was the one who had to travel by the train."
The greatest arrogance and the gratest timidity are
equal to the greatest self-ignorance.
http://ramkhedia.com/book-details/has-love-an-end-ebook-has-love-an-end-ebook
unnoticed for most of the time. As the socially most important
form of learning, it is a necessary precondition for personality
development. But if the identification model is not developed
further in accordance with the prevailing level of personality,
it can cause disturbance and conflicts. These are based on
the misunderstanding that one does not differentiate between
one's own personality and behavior patterns of the model.
The prerequisite for understanding what another person is
thinking or feeling is that we put ourselves in his position
This action can be a projection.
Projection means the transfer of conscious and
unconscious expectations, as well as characteristics of one's
own personality to the outer world and the social partners.
People unknowingly use "projection" to see them in themselves.
They possess but do not want to see them in themselves. They
see the thorn in others' eyes but not the beam in their own eyes.
"projection" is a systematic dishonesty against oneself and
injustice towards the partner.An example of this is an aggressive
person. If asked why he attacks others, treats them impolitely and
dishonestly, hurts and abuses them, he will reply that he must
defend himself because the others are so big and mean and the
world is so unjust.
Not everyone who has a bald head, has overturned a bottle
of oil.
One can interest this to mean: Do not judge others by
your own standards; ask for the motives.
Questions: Tell me, why do you play the piano for five hours
every day?
Answer: One must only know what one wants.
Questin: And what do you want?
Answer: The adjacment apartment.
A man accompained his friend to the railway station.
When they reached there, the train was ready for departure.
Both the men ran behind the train. One of them succeeded in
jumping into the train. The other man doubled up with
laughter. When someone asked him the reason, he replid,
"Actually I was the one who had to travel by the train."
The greatest arrogance and the gratest timidity are
equal to the greatest self-ignorance.
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